नई दिल्ली। ईरान-अमेरिका टकराव और लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रूट खतरे में आ गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम रास्तों से जहाजों की आवाजाही में रुकावट आने से कच्चे तेल से लेकर उर्वरक और खाद्यान्न तक की सप्लाई चेन बिगड़ने लगी है। अगर संकट लंबा खिंचा तो भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों को महंगाई और ऊर्जा संकट का सीधा झटका लग सकता है।
समुद्री मार्गों से ही दुनिया का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल, गैस और औद्योगिक सामान आता जाता है। तनाव के कारण जहाज कंपनियों को लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ रहा है, जिससे न सिर्फ माल पहुंचने में देरी हो रही है बल्कि बीमा, ईंधन और फ्रेट का खर्च भी दोगुना हो गया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मंगाता है, ऐसे में कच्चे तेल के दाम बढ़ते ही पेट्रोल, डीजल, ट्रांसपोर्ट और फैक्ट्रियों की उत्पादन लागत बढ़ना तय है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इसका सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ेगा। उर्वरक, कीटनाशक और डीजल महंगा होने से खेती की लागत बढ़ेगी, जिसका असर अनाज और सब्जियों के दामों पर पड़ेगा। वहीं उद्योगों में कच्चा माल देरी से पहुंचने और खर्च बढ़ने से उत्पादन घटने और भर्ती धीमी होने की आशंका भी जताई जा रही है।
फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पश्चिम एशिया में तनाव कब थमता है और समुद्री व्यापार कब सामान्य होता है, क्योंकि इसी पर ग्लोबल महंगाई और भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा तय होगी।






