। नारायण सोनी । महासमुंद।
भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी मतदाता सूची की विश्वसनीयता है। निर्वाचन आयोग द्वारा कराया जा रहा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर इसी विश्वसनीयता को बनाए रखने की एक बड़ी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस अब केवल हटाए गए नामों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि यह सवाल उठ रहा है कि मतदाता सूचियां कैसे बनती हैं, उनकी जांच कैसे होती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।
एसआईआर क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों है, इसे समझना जरूरी है। सामान्य संक्षिप्त पुनरीक्षण से अलग यह एक गहन सत्यापन है जिसमें देखा जाता है कि मतदाता जीवित है, अपने पते पर सामान्य रूप से निवास कर रहा है और उसका नाम एक से अधिक जगह दर्ज तो नहीं है। इसका कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 (3) में है जो आयोग को विशेष पुनरीक्षण का अधिकार देता है। 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में माना था कि बिहार में पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था और उसके बाद दो दशकों में तेजी से शहरीकरण, पलायन, मृत्यु की सूचना न मिलना और नामों के दोहराव जैसी स्थितियों के कारण सूची की शुद्धता के लिए एसआईआर आवश्यक हो गया है। बिहार में एसआईआर की शुरुआत 24 जून 2025 को हुई जिसमें 98.01 प्रतिशत मतदाताओं को कवर किया गया और 7.17 करोड़ गणना प्रपत्रों में से 90.89 प्रतिशत प्राप्त होकर डिजिटाइज किए गए। इस दौरान लगभग 20 लाख मृत मतदाता, 28 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित, 7 लाख डुप्लिकेट, 1 लाख पता न लग सकने वाले और 15 लाख वापस न किए गए फॉर्म सामने आए। ये आंकड़े बताते हैं कि समय-समय पर गहन जांच क्यों जरूरी है।
लेकिन शुद्धता के साथ समावेशिता भी उतनी ही जरूरी है। निर्वाचन आयोग ने 20 राज्यों में एसआईआर पूरा कर लिया है और शेष 12 राज्यों में तीसरा चरण शुरू किया है। सुरक्षा उपायों के तहत यदि किसी मतदाता को नोटिस मिलता है तो बूथ लेवल अधिकारी घर जाकर सत्यापन करते हैं, दस्तावेज लेकर ईसीआई-नेट पर अपलोड करते हैं ताकि मतदाता को ईआरओ कार्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें। सुनवाई ऑनलाइन होती है और मतदाता अपने परिवार के किसी वयस्क को अधिकृत कर सकता है। मजदूरों, रात्रि आश्रय में रहने वालों और गरीब नागरिकों के लिए विशेष सहायता डेस्क और शिविर लगाए गए हैं।
गोवा में 97 में से 81 ऐसे मतदाताओं ने फॉर्म 6 भरकर अपना पंजीकरण वापस पाया जिन्हें पहले शामिल नहीं किया गया था। बिहार में ही 77 हजार से अधिक मौजूदा बीएलओ, 20 हजार नए बीएलओ और 4 लाख से अधिक स्वयंसेवकों को बुजुर्ग, दिव्यांग और कमजोर वर्ग की सहायता के लिए लगाया गया और मान्यता प्राप्त दलों के लगभग 1.56 लाख बूथ लेवल एजेंटों ने समानांतर सत्यापन किया। पूरे देश में 20 लाख से अधिक बीएलए निगरानी कर रहे हैं और चुनाव के दिन 100 प्रतिशत वेबकास्टिंग की व्यवस्था है।
30 राज्यों में 13 करोड़ से अधिक नामों को ड्राफ्ट सूची से हटाया जाना विवाद का विषय बना है लेकिन इनमें मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और असत्यापित नाम शामिल हैं इसलिए ड्राफ्ट से नाम हटना मताधिकार से वंचित करना नहीं है। दावे आपत्तियों के लिए समय भी बढ़ाया गया है। दिल्ली में अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2026 और निपटारा 30 नवंबर तक तथा महाराष्ट्र में 12 अक्टूबर तक बढ़ाई गई है। इसी अवधि में 24 जून 2025 से अक्टूबर 2026 के बीच 2.37 करोड़ जेन-जी मतदाता जोड़े गए जो हर महीने लगभग 16 लाख की दर है। यह समावेशिता का संकेत है।
प्रशासनिक और तकनीकी जांच के संबंध में भी पारदर्शिता जरूरी है। ईवीएम स्वतंत्र मशीनें हैं जो किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ी हैं और उनमें एफएलसी, दो चरणों में रेंडमाइजेशन, मॉक पोल, बर्न्ट मेमोरी सत्यापन और पांच मतदान केंद्रों पर वीवीपैट मिलान जैसी सुरक्षा है जिसकी सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2024 में एडीआर बनाम ईसीआई मामले में पुष्टि की थी।
अंततः एसआईआर की विश्वसनीयता दो बातों पर टिकी है सटीक सूची और गलतियों को सुधारने की सुलभ प्रक्रिया। न्यायालय पहले ही आयोग के एसआईआर कराने के अधिकार को बरकरार रख चुका है अब वह कुछ विशेष प्रशासनिक निर्णयों की जांच कर रहा है। यह संतुलन ही संस्थागत जनविश्वास को मजबूत करेगा।






